Wednesday, 22 April 2020

Young Rising Student's Association

 हर धर्म का कल्याण हो जाए

           अगर हमारा नारा हिंदुस्तान हो जाए 🙏
                     तेजस्वी कुमार
                                 अध्यक्ष   YRSA   

About YRSA :-







Young Rising student's Association(यंग राइजिंग स्टूडेंट ऐसोसिएशन)

Information
AbbreviationYRSA
Formation2020
TypeStudent Organization
Legal statusNon-profit organizations
PurposeThe main propose of the organization Is to improve the Declining Education leval in Bihar Day by Day. "Will provide new and strong leadership to youth in politics"
HeadquartersPatna, Bihar, India
Location
  • India
Region served
India
Official language
HindiEnglish
National President
Tejashwi kumar
WebsiteYrsaofficals.blogspot.com

   

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  • Founder :- Puspendra Kumar
  • President:- Tejashwi Kumar 
  • General Secretary :- jack Abhi
  • Joint Secretary :- Nahid Hasan 
  • Treasurer :- Chandan Singh (B.Com
  • Advisor :- Md. Dilshad (B.Tech
  • Social Media incharge :- Vicky Patel

Working committee Members

  • 1. Neyazuddin Ahmad (MBBS 4th Year
  • 2. Pankaj Yadav (MBBS 4th Year
  • 3. Deepak Mishra (BPT 3rd Year)  
  • 4. Ravi Yadav (DHM
  • 5. Vicky Singh (MBA
  • 6. Bhargava kumar 
  • 7. Monu Goswami 
  • 8. Vikash kumar 
  • 9. Kaushal kishore 
  • 10. Shweta jha 
  • 11. Akansha Singh

About YRSA :-

👉  संगठन :

                  Young Rising Student's Association (YRSA) (यंग राइजिंग स्टूडेंट ऐसोसिएशन) एक छात्र संगठन है जो छात्रों से जुड़े तमाम मुद्दों को मजबूती से उठाएगी एवं छात्रों के कल्याण के लिए हमेशा कार्य करती रहेगी !

👉  संगठन का उद्देश्य :-


                           Young Rising Student's Association(YRSA) की  स्थापना का मूल उद्देश्य बिहार में दिन-प्रतिदिन गिरते शिक्षा स्तर में सुधार करना है ! राजनीति में युवाओं को नया और मजबूत नेतृत्व दिलाने के लिए कार्य करेगी

👉  YRSA का नारा :-


                        👉🏻आपका हाथ ✋🏻

                                        हमारा साथ 🤝🏻

                         👉🏻 करके विशवास

                                          चलेंगे एक साथ


👉  कविता के माध्यम से बिहार की शिक्षा के वर्तमान परिदृश्य के बारे में जानते हैं : 


              चलो दीप जलाते हैं , शिक्षा का अलख जगाते हैं " 
चलो जलाएं दीप वहां , जहाँ अभी भी अंधेरा है । ,
              चलो शिक्षा का अलख जगाए वहां , जहां अभी भी छाया अशिक्षा का साया है 
शिक्षा पाकर भिक्षा मांगे , स्वेच्छाधारी मुक्तबिहारी युवजन खाए ठोकर आज । 
            आजादी का स्वप्न दिखाकर , पाखंडी करते हैं राज । 
भ्रष्ट व्यवस्था ने भी डाला , अब यहाँ डेरा है । 
           पूरा देश में झूठा सुशासन का डंका पिटवाया है 
शिक्षा स्तर को दिन - प्रतिदिन बदतर बनवाया है
             चलो दीप जलाते हैं , शिक्षा का अलख जगाते हैं | 
बिहार को भी एक शिक्षित राज्य बनाते हैं
           चलो  युवाओं को  YRSA के मूद्दो से  रूबरू कराते हैं
                       Poem By 
                             Tejashwi kumar
                                     अध्यक्ष YRSA 

  YRSA (Young Rising student's Association)

     # उपचार जानने से पहले बिमारी को विस्तृत से जानते हैं :-

 *  शिक्षा को सुलभ बनाने के लिए बिहार में शैक्षिक जागरूकता फैलाने की जरूरत है। लेकिन, शिक्षा के महत्व का विश्लेषण किए बिना यह अधूरा है


👉  आइए जानते हैं पहले शिक्षा के बारे में विस्तार से :-


         *   किसी भी व्यक्ति की प्रथम पाठशाला उसका परिवार होता है, और मां को पहली गुरु कहा गया है। शिक्षा वो अस्त्र है, जिसकी सहायता से बड़ी से बड़ी कठिनाइयों का सामना कर सकते है। वह शिक्षा ही होती है जिससे हमें सही-गलत का भेद पता चलता है। एक वक़्त की रोटी ना मिले, चलेगा। किंतु शिक्षा जरुर मिलनी चाहिए। शिक्षा पाना प्रत्येक प्राणी का अधिकार है।

         *   शिक्षा एक महत्वपूर्ण उपकरण है, जो हर किसी के जीवन में बहुत उपयोगी है। शिक्षा वह है जो हमें पृथ्वी पर अन्य जीवित प्राणियों से अलग करती है। यह मनुष्य को पृथ्वी का सबसे चतुर प्राणी बनाती है। यह मनुष्यों को सशक्त बनाती है और उन्हें जीवन की चुनौतियों का कुशलता से सामना करने के लिए तैयार करती है।
                   
          *    शिक्षा शब्द संस्कृत के ‘शिक्ष’ धातु से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है, सिखना या सिखाना। अर्थात जिस प्रकिया द्वारा अध्ययन और अध्यापन होता है, उसे शिक्षा कहते हैं।

👉 धर्म ग्रंथों में भी शिक्षा को महत्वपूर्ण बताया गया है :-


       *   गीता के अनुसार, “सा विद्या विमुक्ते”। अर्थात शिक्षा या विद्या वही है जो हमें बंधनों से मुक्त करे और हमारा हर पहलु पर विस्तार करे।

        *   कुरान की पहली आयत जब आयी थी तो उसकी शुरुआत ‘इकरा’ शब्द से हुई, ‘इकरा’ का मतलब ‘पढो


        *    टैगोर के अनुसार, “हमारी शिक्षा स्वार्थ पर आधारित, परीक्षा पास करने के संकीर्ण मक़सद से प्रेरित, यथाशीघ्र नौकरी पाने का जरिया बनकर रह गई है जो एक कठिन और विदेशी भाषा में साझा की जा रही है। इसके कारण हमें नियमों, परिभाषाओं, तथ्यों और विचारों को बचपन से रटना की दिशा में धकेल दिया है। यह न तो हमें वक़्त देती है और न ही प्रेरित करती है ताकि हम ठहरकर सोच सकें और सीखे हुए को आत्मसात कर सकें।”

          *    महात्मा गांधी के अनुसार, “सच्ची शिक्षा वह है जो बच्चों के आध्यात्मिक, बौद्धिक और शारीरिक पहलुओं को उभारती है और प्रेरित करती है। इस तरीके से हम सार के रूप में कह सकते हैं कि उनके मुताबिक़ शिक्षा का अर्थ सर्वांगीण विकास था।”

            *   स्वामी विवेकानन्द के अनुसार, “शिक्षा व्यक्ति में अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है।”

            *    अरस्तु के अनुसार, “शिक्षा मनुष्य की शक्तियों का विकास करती है, विशेष रूप से मानसिक शक्तियों का विकास करती है ताकि वह परम सत्य, शिव एवम सुंदर का चिंतन करने योग्य बन सके।”


  👉 शिक्षा को सुलभ बनाने के लिए देश में शैक्षिक जागरूकता फैलाने की जरूरत है। लेकिन, शिक्षा के महत्व का विश्लेषण किए बिना यह अधूरा है


           *   शिक्षा के माध्यम से ही हम अपने सपने पूरे कर सकते हैं। जीवन को नयी दशा और दिशा दे सकते हैं। बिना शिक्षा के हम कुछ भी मुकाम हासिल नहीं कर सकते। आजकल जीविकोपार्जन करना हर किसी की जरुरत है, जिसके लिए आपका शिक्षित होना अत्यंत आवश्यक है। आज की पीढ़ी का बिना पढ़े-लिखे भला नहीं हो सकता।

            *   शिक्षा से ही रोजगार के अवसरों का सृजन होता है। आज वही देश सबसे ताकतवरों की श्रेणी में आता है, जिसके पास ज्ञान की शक्ति है। अब वो दिन गये, जब तलवार और बंदूकों से लड़ाईयां लड़ी जाती थी, अब तो केवल दिमाग से खून-खराबा किए बिना ही बड़ी-बड़ी लड़ाईयां जीत ली जाती हैं।


👉 आइए जानते हैं  शिक्षा का अधिकार देने वाले कानून के बारे में विस्तार से :- 


               *कोई भी कानून बनने से ज्यादा वह कितना धरातल पर उतरा है, यह मायने रखता है*

     *   वैसे शिक्षा पाना हर किसी का अधिकार है। लेकिन अब इस पर कानून बन गया है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि अब हर किसी को अपने बच्चों को पढ़ाना अनिवार्य है। ‘निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा अधिनियम’ के नाम से यह कानून 2009 में लाया गया। शिक्षा का अधिकार’ हमारे देश के संविधान में वर्णित मूल अधिकारों में से एक है।

       *   46वें संविधान संशोधन, 2002 में मौलिक अधिकार के रुप में चौदह साल तक के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने का नियम है। शिक्षा का अधिकार (आरटीआई एक्ट) संविधान के 21अ में जोड़ा गया है। यह 1 अप्रैल, 2010 से प्रभावी है। आरटीआई एक्ट में निम्न बातें बतायी गयीं हैं।

       *    इस विधान के अनुसार अब किसी भी सरकारी विद्यालयों में बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रावधान है।
         
       *   शिक्षा का अधिकार कानून विद्यार्थी-शिक्षक-अनुपात (प्रति शिक्षक बच्चों की संख्या), कक्षाओं, लड़कियों और लड़कों के लिए अलग शौचालय, पीने के पानी की सुविधा, स्कूल-कार्य दिवसों की संख्या, शिक्षकों के काम के घंटे से संबंधित मानदंड और मानक देता है।
     
        *    भारत में प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय (प्राथमिक विद्यालय मध्य विद्यालय) को शिक्षा के अधिकार अधिनियम द्वारा निर्धारित न्यूनतम मानक बनाए रखने के लिए इन मानदंडों का पालन करना है।
जो बच्चे किसी कारणवश उचित समय पर विद्यालय नहीं जा पाते, उन्हें भी उचित कक्षा में प्रवेश देने का नियम है।साथ ही यह प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति भी करता है।

           *    यह संविधान में उल्लेख किए गये मूल्‍यों के हिसाब से पाठ्यक्रम के विकास के लिए प्रावधान करता है। और बच्‍चे के समग्र विकास, बच्‍चे के ज्ञान, सम्भावना और प्रतिभा निखारने तथा बच्‍चे की मित्रवत प्रणाली एवं बच्‍चा केन्द्रित ज्ञान प्रणाली के द्वारा बच्‍चे को डर, चोट और चिंता से मुक्‍त करने को संकल्पबध्द है।


 👉 हमारा देश प्राचीनकाल से ही शिक्षा का केंद्र रहा है। भारत में शिक्षा का समृद्ध और दिलचस्प इतिहास रहा है। ऐसा माना जाता है कि प्राचीन दिनों में, शिक्षा को संतों और विद्वानों द्वारा मौखिक रूप से दिया जाता था और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जानकारी को प्रेषित किया जाता था।

             *  पत्रों के विकास के बाद, यह ताड़ के पत्तों और पेड़ों की छाल का उपयोग करके लेखन का रूप ले लिया। इससे लिखित साहित्य के प्रसार में भी मदद मिली। मंदिरों और सामुदायिक केंद्रों ने स्कूलों की भूमिका बनाई। बाद में, शिक्षा की गुरुकुल प्रणाली अस्तित्व में आई।


👉 आइए जानते हैं शिक्षा पर आधुनिकीकरण  के प्रभाव को :- 

              *   शिक्षा समाज में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। शिक्षा ही हमारे ज्ञान का सृजन करती है, इसे छात्रों को हस्तांतरित करती है और नवीन ज्ञान को बढ़ावा देती है। आधुनिकीकरण सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन की एक प्रक्रिया है। यह मूल्यों, मानदंडों, संस्थानों और संरचनाओं को शामिल करने वाली परिवर्तन की श्रृंखला है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के अनुसार, शिक्षा व्यक्ति की व्यक्तिगत जरूरतों के हिसाब से नहीं होती है, बल्कि यह उस समाज की जरूरतों से उत्पन्न होती है, जिसमें व्यक्ति सदस्य होता है।

              *     एक स्थिर समाज में, शैक्षिक प्रणाली का मुख्य कार्य सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ियों तक पहुंचाना है। लेकिन एक बदलते समाज में, इसका स्वरुप पीढ़ी-दर-पीढ़ी बदलते रहता हैं और ऐसे समाज में शैक्षणिक व्यवस्था को न केवल सांस्कृतिक विरासत के रुप में लेना चाहिए, बल्कि युवा को उनमें बदलाव के समायोजन के लिए तैयार करने में भी मदद करनी चाहिए। और यही भविष्य में होने वाली संभावनाओं की आधारशिला रखता है।

               *    आधुनिक शैक्षणिक संस्थानों में कुशल लोग तैयार होते हैं, जिनके वैज्ञानिक और तकनीकी ज्ञान से देश का औद्योगिक विकास होता है। व्यक्तिवाद और सार्वभौमिकतावादी नैतिकता आदि जैसे अन्य मूल्यों को भी शिक्षा के माध्यम से विकसित किया जा सकता है। इस प्रकार शिक्षा आधुनिकीकरण का एक महत्वपूर्ण अस्त्र हो सकता है। शिक्षा के महत्व को इस तथ्य से महसूस किया जा सकता है कि सभी आधुनिक समाज शिक्षा के सार्वभौमिकरण पर जोर देते हैं और प्राचीन दिनों में, शिक्षा एक विशेष समूह के लिए केंद्रित थी। लेकिन शिक्षा के आधुनिकीकरण के साथ, अब हर किसी के पास अपनी जाति, धर्म, संस्कृति और आर्थिक पृष्ठभूमि के बावजूद शिक्षा प्राप्त करने की सुविधा है।




👉  आइए अब जानते हैं  बिहार के मौजूदा शिक्षा स्तर को विस्तार  से :- 

  * ​ बिहार की गिरती शिक्षा व्यवस्था :-

                   *  एक समय विश्व को ज्ञान की पाठ पढ़ाने वाली, विश्व को नालंदा और विक्रमशिला जैसी अतुलनीय विश्वविद्यालय देनेवाली बिहार की धरा में शिक्षा के हालात आज अतिचिन्तनीय हो गई हैं। चारों तरफ बिहार के शिक्षा व्यवस्था के सूरते-हाल पर बदनामी तेजी से फैलती जा रही है। बिहार के एक नागरिक होने के नाते व्यक्तिगत तौर पर सभी को  चिंतन करनी चाहिए। मैं चाहूंगा, बिहार के लोग इस सवाल को गंभीरता से ले।

                     सच पूछा जाय तो आज़ादी के बाद से ही शिक्षा की चुनौतियों पर हमने ध्यान नहीं दिया। पहले शिक्षा मंत्री से अबतक के शिक्षा मंत्रियों को ध्यानपूर्वक देखिये – बद्रीनाथ वर्मा,सत्येंद्र नारायण सिंह से लेकर आज तक के शिक्षा मंत्री को। इनमे कुछेक को छोड़कर सबने शिक्षा के स्तर को गिराया। कर्पूरी जी के अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त करने के फैसले कालांतर में आत्मघाती साबित हुए। इससे आधुनिकता के दौर में बिहारवासियों का अंग्रेजी के प्रति रुझान कम हुआ।

* सरकार की कुव्यवस्था :-

                   *  एक वर्ग ये भी मानते है कि अँग्रेजी के अनिवार्यता समाप्त होने से बहुजनवर्ग की रुझान शिक्षा की ओर तेज हुआ। लेकिन गहन अध्ययन करने पर हम पाते है कि इससे खासकर बहुजन और अल्पसंख्यक समाज अँग्रेजी को छोड़ते गए। परिणामतः वे आधुनिकता की मुख्यधारा से दूर होते चले गए। आज लगभग सभी क्षत्रों में अंग्रेजी की ज्ञान अनिवार्य है। इसके बिना आपकी अच्छे नौकरी की कल्पना करना असंभव सा ही हैं। अतः कर्पूरीजी का अँग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त करना वर्ग विशेष के लिए नुकसानदेह ही रही है।

                     *  रामराज सिंह ने गुणवत्ता विकसित करने की कुछ हद तक कोशिश की। यहाँ केदार पाण्डे सरकार के कार्यकाल में परीक्षाओं के रिजल्ट की समीक्षा करना अतिआवश्यक हैं। इनके समय उत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या कहीं -कहीं दस प्रतिशत भी नहीं थे। इसी कुव्यवस्था ने जयप्रकाश आंदोलन की पीठिका तैयार कर दी। आनेवाले दिनों में जयप्रकाश आंदोलन का यदि ईमानदार अध्ययन हुआ तब यह निष्कर्ष भी आएगा कि इस आंदोलन में अस्सी फीसदी बहुजन वर्ग के पीड़ित छात्र थे। हालांकि उस आंदोलन का मुख्य नारा शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन और भ्रष्टाचार विरोध था, लेकिन यह हकीकत है बिहार के मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर खान उसी वक़्त काम कर रहे थे।

                               “एक रिपोर्ट के अनुसार 2005 में नियुक्ति किए गए हाई स्कूल शिक्षकों में से 90 फीसदी शिक्षकों को अपने विषय का ज्ञान ही नहीं है। वहीं पहले से कार्यरत स्कूल शिक्षकों सहित हाई स्कूल के शिक्षकों में से 50 फीसदी शिक्षक सिफारिश पर जॉब कर रहे हैं। दूसरी ओर कुछ अच्छे शिक्षक हैं, वो पढ़ाना नहीं चाहते। ऐसे में वहां कोचिंग संस्थानों की भरमार लगी है, जिनका उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना रह गया है।”

*   बुनियादी जरूरतों का अभाव :-

                      *    बिहार में शिक्षकों और स्कूल-भवन संबंधी बुनियादी जरूरतों का अभाव सबसे बड़ी रुकावट है। राज्य के स्कूलों में शिक्षकों के पढ़ाने और छात्रों के सीखने का स्तर अभी भी नीचे है। सरकारी प्राइमरी स्कूलों में इन्फ्रास्ट्रकचर यानी बुनियादी जरूरतों वाले ढांचे का घोर अभाव यहां स्कूली शिक्षा की स्थिति को कमजोर बनाए हुए है। दूसरी बात ये कि शिक्षकों और खासकर योग्य शिक्षकों की अभी भी भारी कमी है। जो शिक्षक हैं भी, उनमें से अधिकांश स्कूल से अक्सर अनुपस्थित पाए जाते हैं। निरीक्षण करने वाले सरकारी तंत्र और निगरानी करने वाली विद्यालय शिक्षा समिति के निष्क्रिय रहने को इस बदहाल शिक्षा-व्यवस्था का तीसरा कारण माना गया है।

                           बिहार के स्कूलों में शिक्षकों के पढ़ाने और बच्चों के सीखने का स्तर, गुणवत्ता के लिहाज से बहुत नीचे है। एक तरफ बिहार का गौरवशाली शैक्षणिक अतीत है और दूसरी तरफ आज इस राज्य का शैक्षणिक पिछड़ापन। ये सचमुच बहुत कचोटने वाला विरोधाभास है। पिछले एक दशक में बिहार में साक्षरता वृद्धि की दर 17 प्रतिशत होने को रिपोर्ट में शुभ संकेत माना गया है। लेकिन इस साक्षरता वृद्धि के बावजूद बिहार में साक्षरता का प्रतिशत 63.8 तक ही पहुंच पाया है, जो देश के अन्य राज्यों की तुलना में सबसे कम है।

*  शिक्षा प्रणाली पर प्रश्नचिन्ह :-

                       *  “बिहार सरकार वयस्क साक्षरता, खासकर स्त्री-साक्षरता बढ़ाकर प्राथमिक शिक्षा के प्रति ग्रामीण जनमानस में ललक पैदा कर सकती है। विश्लेषक मानते हैं कि राज्य में प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता पर जाली या परीक्षा में नकल से प्राप्त डिग्री-सर्टिफिकेट वाले अयोग्य शिक्षकों की नियुक्ति से ग्रहण लग सकता है।”

                        *   बोर्ड परीक्षा में चल रही खुलेआम नकल से प्रदेश की शिक्षा प्रणाली पर भी प्रश्नचिन्ह लग गया है। अब तो लोग सवाल उठाने लगे हैं कि क्या बिहार में लोग ऐसे ही आईएस और आईपीएस बनते हैं? बर्ष बोर्ड परीक्षा में भी हो रही धांधली ने राज्य सरकार की कलई खोल दी है। इन सभी प्रश्नों ने देश के शिक्षाविदों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

                        *   बिहार बोर्ड परीक्षा में हो रही नकल के लिए जिम्मेदार केवल सरकार ही नहीं, बल्कि अभिभावक भी हैं। सभी का सपना होता है कि उनका बच्चा हर परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करे। यह सपना कोई बुरा नहीं है। इस परीक्षा में तो छात्रों के अभिभावक ही नकल करा रहे हैं। छात्र भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं। बिहार में पैसे और पैरवी के बल पर टॉपर बनवाने की बात आम हो गई हैं। इस तरह की घटनाएं न सिर्फ बिहार की शिक्षा व्यवस्था, बल्कि प्रतिभा को भी बदनाम करती हैं।


👉  आइए  अब जानते हैं बिहार के उच्च शिक्षा स्तर को विस्तार से :-


 👉  कैसे होगा  बिहार के उच्च शिक्षा स्तर में सुधार, जब विश्वविद्यालयों कि ऐसी है हालत  :- 

                      *   बिहार के विभिन्न विश्वविद्यालय में परीक्षा सत्र में देरी की वजह से लाखों विद्यार्थियों का करियर प्रभावित हो रहा है, साथ ही उन्हें भविष्य के कई अच्छे अवसरों से भी वंचित होना पड़ रहा है। सरकार के सीधे नियंत्रण वाले 13 विश्वविद्यालयों में से 8 की स्थिति तो बेहद निराशाजनक है। ऐसे में बिहार में शिक्षा स्तर के सुधार के लिए बहुत मेहनत करने की आवश्यकता है।
                       *   इन विश्वविद्यालयों में स्नातक और स्नातकोत्तर की परीक्षाएं और परिणाम तय समय से काफी पीछे हैं। एक तरफ़ जहां इन विश्वविद्यालयों में सत्र काफी पीछे चल रहा है, वहीं दूसरी तरफ काफी समय से सिस्टम अपनी जिम्मेदारियों से पूरी तरह मुंह मोड़ता दिखा। सरकार हो या विश्वविद्यालय किसी को भी विद्यार्थियों के भविष्य की कोई चिंता नहीं थी।

👉  विश्वविद्यालय की बिगड़ी व्यवस्था

                       *    गौरतलब है कि बिहार के चार पूर्व राज्यपाल डीवाई पाटिल, रामनाथ कोविन्द (वर्तमान राष्ट्रपति), सत्यपाल मलिक और लालजी टंडन ने भी इन विवि पर सत्र नियमित कर बिहार में शिक्षा स्तर के सुधार को सख्ती बरती थी पर नतीजा वही ढाक के तीन पात।
    
                       *    साल 2019 के इन विश्वविद्यालयों के आंकड़ों  को देखें तो  बिहार के उच्च शिक्षा व्यवस्था का अनुमान लगा पाना बहुत सहज है, कि बिहार के शिक्षा व्यवस्था दिन प्रतिदिन किस तरह  बिगड़ती जा रही है!

  1. मगध विवि :-
                    *   सत्र 2016 -19 के स्नातक के दो पार्ट की परीक्षा हो चुकी थी, तीसरे पार्ट की लंबित थी। 2017-20 में केवल पहले पार्ट की परीक्षा हुई थी। 2018-21 सत्र के किसी भी पार्ट की परीक्षा नहीं हुई थी। वहीं स्नातकोत्तर में 2016-18 और 2017-19 का सत्र डेढ़ साल पीछे चल रहा था।

  2. जेपी विश्वविद्यालय छपरा :- 
                     *   स्नातक का 2015-18 का सत्र करीब डेढ़ साल पीछे चल रहा था। दूसरे पार्ट की परीक्षा चल रही थी, वहीं 2016-19 के विद्यार्थी भी पार्ट-2 की ही परीक्षा दे रहे थे। पीजी में भी 2016-18 का सत्र 28 माह पीछे थी। 2018-20 और 2019-21 में यहां अब तक नामांकन भी नहीं हुआ  था।

   3. पाटलिपुत्र विवि :-
                       *    स्नातक स्तर की स्थिति कमोबेश कुछ हद तक ठीक है लेकिन पीजी में 2018-20 के पार्ट वन की ही परीक्षा हुई  थी। इस विश्वविद्यालय को सितम्बर से मई के बीच इस सत्र के तीन सेमेस्टर की परीक्षा लेने की चुनौती  थी।

    4. पूर्णिया विवि :-
                       *    इस विश्वविद्यालय ने राजभवन को यूजी, पीजी और व्यावसायिक कोर्सों की परीक्षाओं तथा रिजल्ट की तिथि तय कर राजभवन को सौंपी थी तथा आश्वस्त किया था कि जून 2020 तक सत्र नियमित हो जाएगा।

    5. वीकेवीएस आरा :-
                        *    वीकेवीएस आरा विश्वविद्यालय यूजी और पीजी में सत्र छह माह से अधिकतम 11 माह तक विलंबित  थी। इसके कारण विश्वविद्यालय ने छात्र-छात्राओं को 36 असम्बद्ध कॉलेजों में नामांकन ले लेने को बताया  था।

     6. बीएन मंडल विवि :-
                          *    यहां स्नातक में 2015-18 सत्र का रिजल्ट नहीं आया था। बाद के सत्र के विद्यार्थियों की भी परीक्षाएं करीब 16 महीना देेेर थी। पीजी 2016-18 भी 20 माह लेट से चल रहा था।

    7. तिलकामांझी विवि :-
                            *    2016-19 का स्नातक रिजल्ट क्लियर था लेकिन 2017-20 सत्र 14 माह पीछे चल रहा था। वहीं स्नातकोत्तर 2016-18 सत्र 21 माह विलंबित थी। 2017-19 सत्र भी 16 माह लेट चल रहा था।

       8. बीआरए बिहार :-
                             *    स्नातक स्तर की परीक्षाएं महीनों, जबकि पीजी स्तर की परीक्षाएं सालभर विलंबित  थी। 2017-19 का दो सेमेस्टर का परीक्षा यहां बाकी  था।

              कारण एवं निवारण
  
     👉*    Young Rising Student's Association (YRSA) ने बिहार की उच्च शिक्षा को लेकर एक ग्राउंड रिपोर्ट तैयार की है। जिसमें वर्तमान शिक्षा नीतियों पर सवाल उठाया है एवं सुधार के लिए मांग कि है।  YRSA का कहना  कि गलत शिक्षा नीतियों के कारण लगातार उच्च शिक्षा पतन की ओर जा रहा है।

          *  एडमिशन कैसे व्यवस्थित हो इसपर गौर किए बिना सेंट्रलाइज्ड ऑनलाइन एडमिशन प्रोसेस शुरू किया गया।
          *  बिहार की उच्च शिक्षा की बदहाली में शिक्षकों की कमी सबसे बड़ी समस्या है।
          *  वर्तमान में बिहार में उच्च शिक्षा की स्थिति ऐसी है कि अगर पचास विद्यार्थियों के लिए एक शिक्षक हों तो भी करीब 10000 शिक्षकों की बहाली विभिन्न विभागों में करनी होगी। 
          *  आइआइटी में 10 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक होते हैं।
          *  विश्वविद्यालयों में कम से कम 20 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक होने चाहिए, पर बिहार में यदि 10 हजार अतिरिक्त शिक्षकों की बहाली होती भी है तो प्रति 50 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक होंगे और तब भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की अपेक्षा नहीं की जा सकती। 
          * विभिन्न संस्थानों में नियुक्त शिक्षक भी काफी निष्क्रिय हो गए हैं। छात्रों में भी सक्रियता नहीं दिख रही है। लिजिटमेंट पावर का इलिजिटमेंट तरीके से प्रयोग हो रहा है। इसके कारण विश्वविद्यालयों को निर्णय लेने में ही काफी वक्त लग जाता है। जिसके पास यह पावर है वह इसका गलत तरीके से प्रयोग कर रहा है। इससे टकराव की स्थिति पैदा हो रही है और इसका दुष्परिणाम उच्च शिक्षा पर हो रहा है।


👉 गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की अपेक्षा बिहार सरकार से करना महज छलावा : YRSA 

             *     YRSA का कहना है कि उच्च शिक्षा के लिए महज पांच फीसद दिया जाना उच्च शिक्षा के लिए छलावा है। इससे तो वर्तमान स्थिति को भी सही तरीके से चलाना मुश्किल है। ऐसे में नए शिक्षकों की नियुक्ति और इंफ्रास्ट्रकचर को भी डेवलप नहीं किया जा सकता। हर क्षेत्र में पॉलिसी फेल हो रहा है और विवि के लिए बनाए गए रेगुलेशन भी फ्लॉप हो रहा है। सैंकड़ों कॉलेज डिग्री बांट रहे हैं और उसके लिए भी हजारों विद्यार्थियों की भीड़ लगी है।

              *     विद्यार्थी को भी क्वालिटी से मतलब नहीं और पढ़ाई पूरी होने के बाद जॉब नहीं होने पर बेरोजगारी की लिस्ट और बढ़ती जा रही है। ऐसे में शिक्षक और विद्यार्थियों को एक नीति बनाकर साथ चलना होगा। विद्यार्थियों को प्रयास करना चाहिए कि जो शिक्षक स्टाप रूम में बैठे हैं उन्हें क्लास तक लाने के लिए बाध्य करें और शिक्षक को भी चाहिए कि कक्षाओं में विद्यार्थियों की कमी हो देखते हुए ऐसी नीति बनाएं कि विद्यार्थियों का कक्षाओं की ओर झुकाव बढ़े।

👉 इक्यूपमेंट्स हो गए बेकार : 

           *   पटना विश्वविद्यालय की प्रोवीसी बिहार के किसी भी कॉलेज या विश्वविद्यालय में कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई प्रॉपर तरीके से नहीं होती है। इस कारण यहां के विद्यार्थी ठीक तरीके से फ्रेमवर्क नहीं कर पाते। विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों में इक्यूपमेंट्स की स्थिति दयनीय है। देखरेख नहीं होने के कारण करोड़ों के उपकरण खराब हो गए हैं या उनका अस्तित्व समाप्त होने के कगार पर है। इसके लिए फंड भी नहीं मिल रहा।

👉 प्रभावित होता है शिक्षा का स्तर :-

            *    कुलपति को प्रत्येक पंद्रह दिनों पर राजभवन में बुलाकर उन्हें ट्यूशन दिया जाता है। अगर कुलपतियों को ट्यूशन की जरूरत है तो ऐसे में इसके चयन समिति पर सवाल खड़ा होता है।  कुछ कुलपति कहते हैं कि राजभवन में अच्छा लगता है। जब कुलपति ऐसी बात करेंगे तो उच्च शिक्षा के हालात की कामना की जा सकती है। शिक्षकों के चयन में पारदर्शिता होनी चाहिए। 
     
             *      YRSA के सदस्यों को इस गिरती हुई शिक्षा को बचाने के लिए आगे आना होगा। 


 👉  आइए जान लेते हैं अब बिहार का स्वास्थ्य व्यवस्था को विस्तार से :- 
           *    बिहार में चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था सवालों के घेरे में है. अब और भी गंभीर और चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं. मुजफ्फरपुर में लगातार  हर साल हो रही बच्चों की मौत के बीच बिहार की खस्ताहाल स्वास्थ्य सेवा बिल्कुल उजागर है. अब नए तथ्य बता रहे हैं कि पिछले कुछ वर्षों में हालात बिगड़े ही हैं.
           *    नकारा स्वास्थ्य व्यवस्था बिहार में हाल ही में सैकड़ो बच्चे # AES ( एक्यूट एन्सेफलीटीस सिंड्रोम ) , जिसे इस क्षेत्र में चमकी बुखार के नाम से जाना जाता हैं , से ग्रस्त हो काल के गाल समा गए । ये बीमारी पूरे क्षेत्र में सालों से पैर पसारती रही हैं । 
           *   AES से पिछले कई वर्षों से मौतें हो रही हैं । लेकिन सरकार की निरंकुशता के कारण , इस बीमारी से लड़ने के लिए कोई व्यवस्था नहीं किया गया । 
           *   साल दर साल सरकार सिर्फ नए तकनीक एवं आधुनिक अस्पताल मुहैया कराने की घोषणा करती आई हैं । लेकिन धरातल पर इन घोषणाओ का क्रियान्वयन शून्य है । 
           *   विपक्ष सरकार पर आरोप लगाती नज़र आई कि निजी अस्पतालों को फायदा पहुँचाने के लिए सरकारी अस्पतालों को पंगु बनाया जा रहा है । ये भी आरोप लगाया गया कि सत्तासीन लोग ही निजी अस्पतालों संचालन कर रही है
         *    बिहार इकॉनोमिक सर्वे 2018-19 के मुताबिक बिहार में प्रति 10 लाख लोगों पर 2012 में औसतन 109 हेल्थ सेंटर थे जो 2016 में घटकर 100 हुए और फिर दो साल बाद और घट कर 2018 में 99 हो गए. यानी 7 साल में बिहार में 10 लाख लोगों पर औसत हेल्थ सेंटरों की संख्या 10 कम हो गई.

         *    राज्य में आबादी में हो रही बढ़ोत्तरी के अनुपात में हेल्थ सेन्टरों की संख्या में बढ़ोत्तरी की जानी चाहिए थी. ये ऐसे वक्त पर हुआ जब इन वर्षों में बिहार की जनसंख्या में अच्छी बढ़ोत्तरी रजिस्टर की गई. यही हालत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की भी रही है जिनकी संख्या में ना के बराबर वृद्धि हुई है.

          *   2012-2018 के बीच प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की संख्या में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई, वो 533 पर बने रहे. इन सात वर्षों में स्वास्थ्य उप केंद्र की संख्या 9696 से बढ़कर 9949 हो गई, यानी सिर्फ 2.54% की बढ़ोत्तरी. अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 1330 से 1379 हुए...यानी सिर्फ 3.6% की बढ़ोत्तरी. अगर सभी स्वास्थ्य केंद्र को देखें तो 2012-2018  के बीच इनकी संख्या 11,559 से 11,891 तक पहुंची. यानी इन साल वर्षों में इनकी संख्या में सिर्फ 2.6% का इज़ाफा हुआ.

           *    मामला राज्य सरकार के अधीन आता है. राज्य सरकार को इसकी जवाबदेही लेनी होगी. ये हाल तब है जब चार साल में बिहार सरकार का स्वास्थ्य बजट 83 फ़ीसदी बढ़ा है. 2014-15 में स्वास्थ्य पर बिहार सरकार का कुल खर्च 3604 करोड़ था जो 2017-18 में ये बजट बढ़कर 6535 करोड़ रुपये हो गया.


​​​​​​​​​स्वास्थ्य लिहाज़ से बिहार में हालात और बिगड़े हैं : -   

           *   नीति आयोग द्वारा देशभर के राज्यों का स्वास्थ्य सूचकांक जारी किया जाता है.! बिते वर्ष भी जारी किया गया जिसमें बड़े राज्यों में बिहार सबसे निचले पायदान पर रहा जबकि केरल शीर्ष पर रहा.

          *   स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा विश्वबैंक के तकनीकी सहयोग से तैयार नीति आयोग की ‘स्वस्थ्य राज्य प्रगतिशील भारत’ शीर्षक से जारी रिपोर्ट में राज्यों की रैंकिंग से यह बात सामने आई है.

           *  इस रिपोर्ट में इन्क्रीमेन्टल रैंकिंग यानी पिछली बार के मुकाबले सुधार के स्तर के मामले में 21 बड़े राज्यों की सूची में बिहार 21वें स्थान के साथ सबसे नीचे है. 
           *  रिपोर्ट के अनुसार संदर्भ वर्ष 2015-16 की तुलना में 2017-18 में स्वास्थ्य क्षेत्र में बिहार का संपूर्ण प्रदर्शन सूचकांक 6.35 अंक गिरा है. 

           *  यह रैंकिंग 23 संकेतकों के आधार पर तैयार की गई है. इन संकेतकों को स्वास्थ्य परिणाम (नवजात मृत्यु दर, प्रजनन दर, जन्म के समय स्त्री-पुरूष अनुपात आदि), संचालन व्यवस्था और सूचना (अधिकारियों की नियुक्ति अवधि आदि) तथा प्रमुख इनपुट / प्रक्रियाओं (नर्सों के खाली पड़े पद, जन्म पंजीकरण का स्तर आदि) में बांटा गया है.

           *  यह दूसरा मौका है जब आयोग ने स्वास्थ्य सूचकांक के आधार पर राज्यों की रैंकिंग की गई है. इस तरह की पिछली रैंकिंग फरवरी 2018 में जारी की गई थी. उसमें 2014-15 के आधार पर 2015-16 के आंकड़ों की तुलना की गई थी.

           *  इस रिपोर्ट में पिछले बार के मुकाबले सुधार और कुल मिलाकर बेहतर प्रदर्शन के आधार पर राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों की रैंकिंग तीन श्रेणी में की गई है. पहली श्रेणी में 21 बड़े राज्यों, दूसरी श्रेणी में आठ छोटे राज्यों एवं तीसरी श्रेणी में केंद्र शासित प्रदेशों को रखा गया है.

                    *  सूचकांक में सुधार के पैमाने पर हरियाणा का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा है. उसके 2017-18 के संपूर्ण सूचकांक में 6.55 अंक का सुधार आया है. उसके बाद क्रमश: राजस्थान (दूसरा), झारखंड (तीसरा) और आंध्र प्रदेश (चौथे) का स्थान रहा.

                     *  वहीं, छोटे राज्यों में त्रिपुरा पहले पायदान पर रहा. उसके बाद क्रमश: मणिपुर, मिजोरम और नगालैंड का स्थान रहा. इसमें सबसे फिसड्डी अरूणाचल प्रदेश (आठवें), सिक्किम (सातवें) तथा गोवा (छठे) का स्थान रहा.

                      *  रिपोर्ट के अनुसार केंद्रशासित प्रदेशों में दादर एंड नागर हवेली तथा चंडीगढ़ में स्थिति पहले से बेहतर हुई है. सूची में लक्षद्वीप सबसे नीचे तथा दिल्ली पांचवें स्थान पर है.

                       *  संदर्भ वर्ष की संपूर्ण रैंकिंग में उत्तर प्रदेश सबसे निचले 21वें स्थान पर है. उसके बाद क्रमश: बिहार, ओडिशा, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड का स्थान है. वहीं शीर्ष पर केरल है. उसके बाद क्रमश: आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात का स्थान हैं.                

                          *  ‘स्वास्थ्य क्षेत्र में अभी काफी काम करने की जरूरत है…इसमें सुधार के लिये स्थिर प्रशासन, महत्वपूर्ण पदों को भरा जाना तथा स्वास्थ्य बजट बढ़ाने की जरूरत है.’

👉  *मिडिया रिपोर्ट कि माने तो बिहार में दूसरे एम्स के निर्माण के लिए नीतीश सरकार ने नहीं दी जमीन :


                           *  बिहार में दिमागी बुखार (एक्यूट एनसिफेलाइटिस सिंड्रोम) का कहर हर वर्ष जारी है. इस बीच यह महत्वपूर्ण बात सामने आई है कि बिहार में दूसरा नया एम्स नहीं बन पाया क्योंकि नीतीश सरकार चार साल तक राज्य में दूसरे प्रस्तावित एम्स के लिए ज़मीन आवंटित नहीं कर पाई. इसके बाद भारत सरकार ने दरभंगा मेडिकल कालेज एंड हास्पिटल को ही एम्स की तर्ज़ पर अपग्रेड करके का फैसला किया. यह महत्वपूर्ण है कि 28 नवंबर 2014 को स्वास्थ्य मंत्रालय ने PMSSY के तीसरे चरण में जिन 39 अस्पतालों को अपग्रेड करने का फैसला किया था उसमें दरभंगा अस्पताल भी शामिल था.

                           *  बिहार में दिमागी बुखार के कहर से वहां की चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था का सच सामने आ गया है. हैरानी की बात यह है कि पाॅच साल पहले मोदी सरकार ने बिहार में दूसरा एम्स खोलने का ऐलान किया था लेकिन बिहार सरकार इसके लिए जरूरी जगह मुहैया नहीं करा पाई

                           *   साल 2015-16 के अपने बजट भाषण में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बिहार में एक नया एम्स खोलने का ऐलान किया था. इसके बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने बार-बार बिहार सरकार से गुज़ारिश की कि 3-4 वैकल्पिक जगहों की जानकारी दें, लेकिन पाच साल तक नीतीश सरकार इसकी पहचान ही नहीं कर पाई.

                            *   19 दिसंबर 2017 को राज्य सभा में दिए लिखित जवाब में स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी चौबे इस बात की पुष्टि कर चुके हैं.13 नए प्रस्तावित एम्स के स्टेटस के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुए बिहार में प्रस्तावित नए एम्स पर उन्होंने राज्य सभा को बताया - "राज्य सरकार से बिहार में एक नया एम्स खोलने के लिए 3-4 वैकल्पिक जगहों की पहचान करने की गुज़ारिश की गई है, लेकिन राज्य सरकार ने अब तक वैकल्पिक जगहों की पहचान नहीं की है."

                            *   जब राज्य सरकार ने जमीन नहीं दी तो तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने लोकसभा चुनावों से ठीक पहले दो मार्च, 2019 को पटना में दरभंगा हास्पिटल को दूसरे एम्स के तर्ज़ पर विकसित करने का ऐलान कर दिया था .



👉 अब आइए जान लेते हैं बिहार में रोजगार की स्थिति के हालात :-


. 👉    ना बिहार में बहार है,

                         ना देश अपना खुशहाल है
   👉        की ना बिहार में बहार है ,
                          ना देश अपना खुशहाल हाल है
      👉  सिर्फ झूठा स्वांग रचती, 
                               हमारी सरकार है
            Poem by    
                    तेजस्वी  कुमार    
                       अध्यक्ष YRSA

👉  बिहार को बहार से  कितना तालमेल हैं आइए जानते हैं विस्तार से  :-  

               *     बिहार विधानसभा में चपरासी के 146 पदों के लिए 5 लाख आवेदन का भरा जाना ही  बिहार में कितना बहार है बताने के लिए काफी है !

   👉 कविता के माध्यम से  पहले जानते हैं

  बिहार में बहार है ,
                    लेकिन बिहार के युवा आज बेरोजगार है !
  सरकारी नौकरी के लिए दिल बेकरार है ,
                    लेकिन आंखों के सामने छाया अंधकार है !
   MBA से लेकर  Graduate तक की कतार है,
                    चपरासी की एक नौकरी की दरकार है!
    ऐही  बिहार में बहार है ,
                   सुसासन कि सरकार है!
                  Poem by
                                 Tejashwi kumar
                                        अध्यक्ष YRSA           


 👉         *    बेरोजगारी का आलम यह है कि मैट्रिक परीक्षा पास करते हैं युवा रोज 5 किलोमीटर दौड़ना शुरू कर देता है । पहले डिफेंस लाइन फिर एसएससी फिर बीपीएससी इतना सब कुछ हो जाता है सिर्फ नौकरी ही नहीं मिलती है ! 

       
                 आप अपने आसपास हर रोज वैसे युवा को देखते होंगे जो डिलीवरी ब्वॉय का काम करते हैं !  जैसे Flipkart, swiggy, Amazon,Zommato etc.. के लिए 
               *   अगर आपको कभी मौका मिले तो आप उनसे उनकी क्वालिफिकेशन के बारे में  पुछिएगा, अधिकतर युवा  ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट कोई बीपीएससी का तैयारी करके आया है, कोई  competitive एग्जाम का तैयारी करके  तो  आया है ! आप खुद सोचिए कि इतने एजुकेटेड होने के बावजूद उन्हें डिलीवरी ब्वॉय का काम करना पड़ रहा है
                *    एक सर्वे के अनुसार 25 हजार से ज्यादा लोग ग्रेजुएट होकर भी डिलीवरी ब्वॉय का काम करने के लिए मजबूर हैं

                *   सरकार आती है जाती है बस रह जाती है तो सिर्फ बेरोजगारी है 
                *    बेरोजगारी क्या होता है कभी दानापुर की दौड़ में जा कर देखिए , जब 250 - 250 का झुंड एक साथ दौड़ने के लिए निकलता है तो जान निकल जाती है देख कर , हाफ्ते हाफ्ते मुंह से खून तक निकलने लगता है । 5 मिनट में 1600 मीटर का दौड़ पूरी करना कोई आसान काम नहीं है ! खुद को लोहे की तरह आग में तपाना पड़ता है । 
                    युवाओं को नौकरी पाने का ऐसा जुनून है कि पूरे रूम के दीवारों पर जीके जीएस चिपकाए रहते हैं फिर भी नौकरी नहीं  मिलती  है
                 *    पटना की गलियों में स्टूडेंट भरे पड़े सुल्तानगंज से मखनिया कुआं तक खाली आपको स्टूडेंट ही मिलेंगे , भिखना पहाड़ी के पास दिवार नहीं है खाली पोस्टर ही दिखाता है , उन पोस्टरों पर Ar फलाना , Dr फलाना बस नाम ही दिखेगा * सब का धंधा चल रहा है इन बेरोजगार युवाओं के वजह से , लेकिन युवाओं को रोजगार नहीं मिलता 
                  *    इतना करने के बाद भी जब युवा जाते हैं  परीक्षा देने तो पता चलता है पेपर पहले ही ठेकेदार लिक कर चुका है । तो सोचिए उस  विद्यार्थी पर क्या गुजरती होगी जो  पूरी मेहनत और ईमानदारी के साथ तैयारी करके परीक्षा केंद्र पर जाते हैं 

                   *    हमारा देश यान से लेकर चंद्रयान तक पहुंच गया है लेकिन भारत सहित पुरे विश्व में ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाला प्रदेश आज अंधकार में है ! किसी का ध्यान अपने बिहार पर नहीं गया . 

   👉     जहां देश की  दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या है वहां पर ना शिक्षा , ना रोजगार , ना स्वास्थ्य का समुचित व्यवस्था है वैसे प्रदेश में बहार केसे हो सकता है । -
      *   संगठन का तात्पर्य बिहार की गरिमा को ठेस पहुंचाना नहीं है , YRSA तो वो सच्चाई बता रहा है जिसे आप कान बंद करके अनसुना नहीं कर सकते हैं! 
       *    वह दृश्य दिखाना चाह रहा है  जो आज राजनीतिक दांवपेच में कहीं अदृष हो गया है,  निजी लाभ और सत्ता के लोभ  ने बिहार को जकड़ रखा हैं 
       *    जहां मानव संसाधन तो है ,पर संसाधन का कोई अता पता नहीं है! बेरोजगार तो बहुत है पर रोजगार का कोई पता पता नहीं है
       *    बिहार को बीमार और लाचार बनाने में जितना राजनीतिक और आर्थिक कारण जिम्मेदार है उससे कहीं ज्यादा वो लोग जिम्मेदार हैं जो उच्चे पदों पर बैठकर बिहार को भुल गए हैं
       *   बिहार ने जितना आईएस  देश को दिया है उसका 10% भी अगर बिहार के लिए   काम करती तो आज बिहार की ऐसी दयनीय स्थिति नहीं रहती

👉 पलायन करने को विवश हैं बिहारवासी :-


                          * पलायन करने को विवश हैं बिहारवासी! जिससे एक बात स्पष्ट हो जाती हैं कि 14 वर्षों तक सत्तासीन रहने के बावजूद नीतीश सरकार , राज्य के मूलभूत व्यवस्था को दुरुस्त नही कर पाई हैं । 
                         *  रोजी रोटी के तलाश में राज्य का एक बड़ा हिस्सा पलायन करने को विवश हैं । बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य की खोज में भी बिहारवासी दर - दर की ठोकरे खाने को विवश हैं । 
                         *  इनके कार्यकाल में नवीन सिंचाई योजनाओं का भी पुर्ण अभाव रहा । शिक्षा , बिजली , उद्योग जैसे अनेक क्षेत्र आज भी 80 के दशक से आगे नही बढ़ पा रही यही । 
                         *  अनेको समस्याओं के जस के तस रहने के बावजूद , नीतीश कुमार खुद को सुशासन बाबू के रूप में प्रचारित करने से पीछे नही हटते ।

            

पलायन के मुख्य कारण :-


                        *   देश में पलायन के कई कारण मौजूद हैं। इसमें सबसे प्रमुख कारण अशिक्षा व बेरोजगारी है। गांवों में शिक्षा का संस्थागत ढांचा नहीं रहने के कारण ग्रामीण शिक्षित नहीं हो पाते हैं। 
                         *  अशिक्षा उन्हें मजदूरी व अन्य काम करने को विवश करती है। ग्रामीण अच्छे व बूरे को नहीं समझ पाते हैं। उन्हें अपने पेट भरने के लिए काम की दरकार होती है। 
                         *  ऐसे में गांवों के गरीब परिवारों को मजदूरी करनी पड़ती है। इन्हें गांव के नजदीक मजदूरी नहीं मिलने के कारण ये महानगरों व बड़े शहरों में पलायन करते हैं। इसके अलावा शिक्षित ग्रामीणों को भी नौकरी नहीं मिल पाती है। उन्हें भी नौकरी के कारण बाहर के शहरों में पलायन करना होता है। 
                        *  सरकार द्वारा भी स्थानीय स्तर पर नौकरी की सुविधाएं मुहैया नहीं करायी गई हैं। इस कारण भी गांवों से लोग महानगरों की ओर पलायन को विवश होते हैं।

पलायन को रोकने के लिए :-


              *  पलायन को रोकने के लिए सरकार व स्वयंसेवी संस्थाओं को प्रचार-प्रसार करने की जरूरत है। बिहार, झारखंड, ओडिसा, छत्तीसगढ़ सहित उग्रवाद प्रभावित राज्यों के सुदूरवर्ती गांवों में विकास के काम थम गए हैं। 
             *  सुदूरवर्ती गांवों में विकास योजनाओं में काम नहीं होने के कारण स्थानीय लोगों को रोजगार नहीं मिल पाता है। 
             *  सरकार को इन क्षेत्रों में विकास योजनाओं में गति प्रदान करने की जरूरत है। इसके अलावा सरकार सुदूरवर्ती गांवों में पलायन के दुष्प्रभावों के बारे में बताए।

              *  छोटे शहरों में होर्डिंग्स व पोस्टरों के जरिए भी प्रचार-प्रसार करें। इन विज्ञापनों के जरिए लोग पलायन के दर्द को समझ सकेंगे। सरकार रेडियो व टेलीविजन के माध्यम से लोगों तक अपनी पहुंच बनाए।

शिक्षा की जरूरत :-


                             *  जिन सुदूरवर्ती गांवों से पलायन होता है, उन क्षेत्रों में शिक्षा का अलख जगाए। सरकार व गैर-स्वयंसेवी संस्थाएं इन क्षेत्रों में जाकर शिक्षा का प्रचार-प्रसार करें। इसके अलावा इन क्षेत्रों में शिक्षा का दीप भी जलाए। 
                              *  स्थानीय स्तरों पर कम से कम मैट्रिक तक की शिक्षा उपलब्ध कराने को आगे आए। बिना शिक्षा के समाज को नहीं बदला जा सकता। लोग अगर शिक्षित होंगे, तो पलायन की समस्याओं को भी समझ सकेंगे। 
                               *  सरकार इन क्षेत्रों में शिक्षा की प्राथमिक, माध्यमिक व उच्च व तकनीकी एवं रोजगारपरक प्रशिक्षण की सुविधा प्रदान कराए। इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को प्रशिक्षण दें, जिससे वे रोजगार से जुड़ सकें और अपनी आमदनी बढ़ा सकें।
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राज्य सरकार अपने लोगों को अपने राज्य में नौकरी देने में विफल :- 



                               *   सरकार अपने लोगों को अपने राज्य में नौकरी देने में विफल रहती है, इसलिए बिहारियों को नौकरी और रोजगार के लिए बाहर जाना पड़ता है. यह कोई तारीफ की बात नहीं, हमारे लिए शर्मिंदगी की बात है.

                                *   प्रवासी बिहारियों के एक कार्यक्रम में बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने अपने संबोधन में कहा  कि चांद पर नौकरी निकले तो बिहारी वहां भी सबसे पहले जाएंगे जो कि बहुत शर्मनाक टिप्पणी है!
                                *   बिहार के लोगों ने उन्हें उनके इस बयान के लिए आड़े हाथ लिया और कहा कि राज्य सरकार अपने लोगों को अपने राज्य में नौकरी देने में विफल रहती है, इसलिए बिहारियों को नौकरी और रोजगार के लिए बाहर जाना पड़ता है. 
                                *  यह कोई तारीफ की बात नहीं, हमारे लिए शर्मिंदगी की बात है. हमें चांद पर नहीं, बिहार में नौकरी चाहिए.

                                 *  दरअसल, ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि पिछले कुछ दिनों से बिहार की सरकार यहां के लोगों द्वारा नौकरी और रोजगार के लिए किए जाने वाले पलायन को उचित ठहराने की कोशिश में है. 
                                 *   सुशील मोदी ने अपने संबोधन में कहा था, यहां के लोगों के बाहर जाने का यह मतलब नहीं है कि हमारा राज्य पिछड़ा हुआ है.आज के जमाने में पलायन को बुरा नहीं माना जाता.  जो बिल्कुल आधारहीन बात है!आप लोग खुद जानते हैं कि कितना आगे है रोजगार के मामले में बिहार 

                                   *  इससे पहले हाल ही में बिहार विधानमंडल में एक सवाल के जवाब में राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी पलायन को उचित ठहराया था. उन्होंने कहा था कि बिहारी अपने हुनर की वजह से बाहर रोजगार पाते हैं, यह शर्म नहीं गर्व का विषय है.

                                     *  मगर खुद बिहार के वे लोग जो रोजी-रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में रह रहे हैं, बिहार सरकार के पलायन के मसले पर लिए गए इस स्टैंड से बहुत सहमत नहीं हैं. सुशील मोदी के बयान पर सोशल मीडिया में आपत्ति करने वालों में सबसे बड़ी संख्या उन्हीं बिहारियों की है, जो बाहर रह कर नौकरी या रोजगार करते हैं. 
                                            *   उनका मानना है कि अगर बिहार में रोजगार की बेहतर संभावना होती और उन्हें उनके हुनर या विशेषज्ञता की वजह से दूसरे राज्यों में आमंत्रित किया जाता तो निश्चित तौर पर गर्व की बात होती. मगर चूंकि हमारे पास अपने राज्य में नौकरी या रोजगार करने का कोई ऑप्शन ही नहीं है, 
                            *   ऐसे में पलायन करना हमारे लिए चॉइस नहीं, लाचारी है. और जब कोई व्यक्ति लाचारी में पलायन करता है तो उसे जहां वह रह रहा है, वहां उचित सम्मान नहीं मिलता. ऐसे में वह पलायन उसके लिए गर्व नहीं शर्म का ही विषय हो सकता है.


                              *  बिहार सरकार के इन दोनों शीर्ष व्यक्तियों का यह बयान राज्य में पलायन और बेरोजगारी की भीषण होती समस्या से मुंह मोड़ने जैसा प्रतीत होता है.
                        *  इसी वर्ष फरवरी माह में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन साइंस, मुंबई ने बिहार  में पलायन की समस्या पर शोध किया था.  इस अध्ययन के मुताबिक बिहार से पलायन करने वाले लोगों में से 80 फीसदी लोग या तो भूमिहीन होते हैं या उनके पास एक एकड़ से कम जमीन होती है. 
                            *  85 फीसदी लोगों ने 10वीं तक की पढ़ाई भी नहीं की होती है. 90 फीसदी लोगों को अकुशल मजदूर का काम मिलता है. इन लोगों की पलायन करने से सालाना औसत आमदनी 26020 रुपए की ही होती है. 
                            *  यानी दो हजार रुपए प्रति माह से कुछ अधिक. ये आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि बिहार में लोग किन परिस्थितियों में पलायन करते हैं. 
                           *  ऐसे में बिहार के मुख्यमंत्री का वह दावा कि बिहार के लोगों को उनके हुनर की वजह से दूसरे राज्यों में रोजगार मिलता है, झूठा साबित हो जाता है.
                                           *  ये आंकड़े इस बात की भी तस्दीक करते हैं कि बिहार में लोगों के पास दो-ढाई हजार रुपए प्रति माह कमाने लायक अवसर की भी भारी कमी है
                               *  तभी वे इतनी आमदनी के लिए भी पलायन कर जाते हैं. दरअसल, बिहार के सीवान और गोपालगंज जिले से कुछ वेल्डर और फिटर लोगों के गल्फ कंट्रीज में रोजगार के लिए जाने को भी पलायन की असली तसवीर मान ली जाती है. जबकि उत्तर बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाकों में पिछले चार-पांच दशकों में पंजाब और हरियाणा के इलाके में खेतिहर मजदूरी के लिए जाने वाले लोगों की संख्या बहुत बड़ी है. 
                        *  बिहार से रोजगार के लिए पलायन करने वाले लोगों में इनकी संख्या सर्वाधिक है. राज्य पलायन करने वालों में सिर्फ तीन फीसदी लोग ही देश से बाहर जाते हैं.
                        *    शेष देश के दूसरे इलाकों में भी जाते हैं. आंकड़े यह भी बताते हैं कि भूमिहीनता और खेती के लायक कम जमीन होना भी रोजी-रोटी के लिए पलायन करने की एक बड़ी वजह है.
                           *   दरअसल सच यही है कि बिहार में नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी की जोड़ी के लगभग 15 साल राज करने के बावजूद रोजगार की संभावनाओं का समुचित विकास नहीं हुआ है.
                        *   बिहार सरकार द्वारा इस वर्ष जारी किए गए आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट भी इस तरफ इशारा करती है. इस रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में नियमित रोजगार पाने वाले लोगों की संख्या रोजगार पाने वालों की कुल संख्या का सिर्फ 11.9 फीसदी है. 
                      * अनियमित रोजगार पाने वाले श्रमिकों की संख्या, यानी जिन्हें कभी रोजगार मिलता है, कभी नहीं, 32.1 फीसदी है, जो राष्ट्रीय औसत 24.3 फीसदी से काफी अधिक है. इन आंकड़ों में 45 फीसदी लोगों की जीविका का आधार खेती बताया गया है. 
                        *  बिहार में ज्यादातर किसान के पास बहुत कम कृषि योग्य भूमि है, ऐसे में खेती पर आश्रित लोगों के रोजगार की स्थिति जगजाहिर है.

बिहार में उद्योग-धंधों की स्थिति :- 


                बिहार में उद्योग-धंधों की स्थिति भी कमबेशी वैसी ही है. आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में संचालित होने वाले कुल उद्योगों की संख्या सिर्फ 2908 है,
               ये सभी कारखाने मिल कर राज्य के एक लाख से कुछ अधिक लोगों को ही रोजगार दे पाते हैं. वह भी सिर्फ औसतन दस हजार रुपए मासिक वेतन के रोजगार
            *   ये कारखाने भी मझोले और निम्न श्रेणी के हैं, इनकी औसत पूंजी छह करोड़ के लगभग है और इनमें बड़ी संख्या कृषि आधारित उद्योग की है. 
            *  जाहिर है, इन परिस्थितियों में बिहार के लोगों को बिहार में ही रोजगार मिलना बहुत मुश्किल काम है, 
           *  इन्हीं वजहों से ज्यादातर बिहार के लोग नौकरी और रोजगार के लिए पलायन करते हैं. 
           *   जैसा कि पहले के आंकड़ों से भी जाहिर है कि रोजगार और नौकरी के लिए पलायन करने वाले ज्यादातर लोग कम पढ़े लिखे और अप्रशिक्षित हैं, 
           *   इसलिए उन्हें बाहर कोई ढंग का रोजगार भी नहीं मिलता. बहुत कम मेहनताने पर ज्यादातर लोग अकुशल मजदूर के रूप में काम करते हैं. 
           *   इसलिए ऐसा कहना लोगों को हास्यास्पद लगता है कि बिहार के लोग अपने हुनर की वजह से देश भर में नौकरी और रोजगार के लिए जाते हैं. 
           *  सच्चाई यही है कि यहां के लोगों की पहचान सस्ते और अकुशल मजदूर के रूप में है.
            *  चूंकि राज्य के युवाओं और मजदूरों के प्रशिक्षण की भी कोई बेहतर व्यवस्था राज्य में नहीं है. इसलिए यह स्थिति स्वाभाविक है.
             *   लेकिन दुखद स्थिति यह है कि राज्य में प्रशिक्षित और शिक्षित युवाओं के लिए भी कोई बेहतर रोजगार उपलब्ध नहीं है
              *  अभी पिछले ही साल राज्य के प्लस टू स्कूलों में अतिथि शिक्षकों के लिए बहुत कम मानदेय वाली बहाली निकली थी, 
              *   जिसमें आवेदन करने वालों में सबसे बड़ी संख्या बीटेक पास युवाओं की थी. 
              *  पिछले दिनों बिहार विधान सभा के चतुर्थ श्रेणी के पदों के लिए निकली कुछ सौ सीटों की नियुक्ति में भी हजारों बीटेक डिग्रीधारियों ने आवेदन किया. 
              *  मतलब यह कि पलायन के बावजूद इन युवाओं के पास शिक्षा के अनुरूप बेहतर रोजगार की स्थिति नहीं है. 
              *  ऐसे में लोगों का बिहार के डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी के इस बयान पर भड़कना स्वाभाविक है कि बिहार के युवा चांद पर भी नौकरी हासिल कर सकते हैं. 
              *  इन युवाओं की नाराजगी राज्य सरकार से यही अनुरोध करती है कि कृपया हमारे लिए अपने राज्य बिहार में ही नौकरी की व्यवस्था कराएं. हम नौकरी के लिए चांद और सूरज पर भटकना नहीं चाहते.



👉  बिहार के आकड़े  क्या कहते हैं जानिए :-

       * बिहार में कृषि की दर 3.7% है  

       * बिहार में उद्योगों की की तादाद सिर्फ 5345 है 

      *  बिहार में बेरोजगारी औसत 17.5% है 

      * बिहार में 2 करोड़ 80 लाख लोग 15 से 30 साल के बीच है
        *  जीवन प्रत्याशा के मामले में बिहार देश के सबसे बुरे राज्यों में से एक है ,21 बड़े राज्यों की तालिका में बिहार का 14वां स्थान है

           *      शिशु मृत्यु दर में बिहार की स्थिति निरंतर खराब होती जा रही है और यह  7वें  से खिसक कर अब 20वें  स्थान पर पहुंच गया है
    *  महिला साक्षरता दर में बिहार का स्थान नीचे से दूसरा है
    *   बिहार सबसे ज्यादा गरीबी किधर वाले तीन भारतीय राज्यों में से एक है
    *    सकल घरेलू राज्य उत्पाद के आधार पर प्रति व्यक्ति आय में बिहार बड़े राज्यों की सूची में सबसे नीचे स्थान पर है (22/22)
       *     बिहार प्राथमिक शिक्षा में देश के सर्वाधिक ड्रॉप आउट वाले राज्य में से एक है और यह नीचे से तीसरे स्थान पर है
          *     मानव विकास सूचकांक में देश के 21 बड़े राज्यों की सूची में  बिहार आज भी अंतिम पायदान पर है 
          *     शहरीकरण में बिहार भारत के सबसे खराब प्रदर्शन वाले 2 राज्यों में से एक है

         *        ग्रामीण प्रति व्यक्ति व्यय में बिहार सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों की श्रेणी में है 22 राज्यों में इसका स्थान 18वां है
         
     *       2005 से 2018 के बीच बिहार में महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराध 4.4 गगुना बढे़ है ं
      *      मातृ मृत्यु दर को सुधारने में बिहार बुरी तरह विफल रहा है, और यह अभी भी 165 है जो राष्ट्रीय औसत 130 से बहुत अधिक है
       *       निवल घरेलू राज्य उत्पाद के आधार पर भी प्रति व्यक्ति आय में बिहार बड़े राज्यों की सूची में सबसे निचले स्थान पर है (22/22)
        *      बिहार की  साक्षरता दर देश में सबसे कम है
         *       पूरे देश में अनुसूचित जातियों के विरुद्ध होने वाली अपराधिक घटनाएं सबसे ज्यादा बिहार में हो रही है, इस आधार पर यह देश में सबसे निचले (29वें) स्थान पर है

           *   प्रति व्यक्ति शहरी व्यय में स्थिति और भी बुरी है, 22 राज्यों की तालिका में बिहार 22वें स्थान पर है
           *    बिहार 8 शीर्ष राज्यों में है- जहां बेरोजगारी दर 10% से ज्यादा, सिर्फ 12% करते हैं नौकरी
          *    20 वर्षों में 60 फीसदी आबादी को होगी रोजगार की जरूरत
जनसंख्या का संकेत हैं कि अगले 20 वर्षों में कामकाजी आबादी का हिस्सा बढ़कर तकरीबन 60% हो जाएगा

  

Note :- YRSA किसी एक विशेष जाति धर्म समुदाय के छात्रों क लिए नहीं है बल्कि संपूर्ण धर्म जाति समुदाय के छात्रों के  हितों एवं उत्थान  हेतु  कार्य करेगी


आइए जानते हैं अब YRSA  के तमाम महत्वपूर्ण मुद्दों  के बारे में :-

  
👉 बिहार में दिन-प्रतिदिन  गिरते शिक्षा स्तर  के लिए आवाज उठाना एवं अपने स्तर से शिक्षा का समुचित व्यवस्था करना 
👉 गरीब वर्गों के बच्चों के लिए No Gain - No Loss के  फार्मूले पर बेहतर शिक्षा की व्यवस्था करेगी
👉   बिहार के सरकारी  विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में गिरती शिक्षा व्यवस्था  के खिलाफ आवाज उठाना एवं सरकार से इनमें  उच्च श्रेणी का शिक्षक एवं बेहतर शिक्षा व्यवस्था करने की मांग करना 
👉  विद्यालयों महाविद्यालयों में पुस्तकालय की मांग
👉   पुस्तकालयों में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्र छात्राओं के लिए आवश्यक पत्र पत्रिकाएं उपलब्ध कराने की मांग 
👉   रूम का किराया फिक्स  करवाने की मांग ,   रूम का किराया हर महीने बिना किसी सूचना के मकान मालिक द्वारा मनमाने ढंग से बढ़ा दिया जाता है जिससे प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्र-छात्राओं को  आर्थिक परेशानी झेलनी पड़ती है
👉  बिहार के राजनीति में युवाओं की भूमिका को सशक्त बनाना
👉  YRSA  का विशेष संकल्प है, आने वाले दिनों में बिहार में युवाओं को  राजनीति में अहम नेतृत्व दिलाना 
जैसे कि 
  •  छात्र संघ का चुनाव
  •  पंचायत  स्तर का चुनाव
*  बिहार में कुल पंचायत की संख्या 8474 है
*    बिहार में गांव की संख्या  लगभग 45143 है
*   जिसमें 115876 पंच पद के लिए चुनाव होता है
*    जिसमें 8474 सरपंच पद के लिए चुनाव होता है
*   जिसने 8474  मुखिया पद के लिए चुनाव होता है
  बिहार में  1162 जिला पार्षद पद के लिए  चुनाव होता है

  • नगर परिषद का चुनाव 

  *  बिहार में 42 नगर 
नगरपरिषद है
       *   जिसमें 1365 वार्ड काउंसलर पद के लिए चुनाव होता है

  •  विधानसभा का चुनाव

*   बिहार में 243 विधानसभा  का सीट है
*  जिसमें 243 विधायक पदों के लिए चुनाव होता है

  •  लोकसभा  का चुनाव

* बिहार में 40 लोकसभा सीट है
*   जिसमें 40 सांसद पदों के लिए चुनाव होता है

👉 बिहार के पिछड़े वर्गों के युवाओं को मुख्यधारा में लाना

👉 समाज में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाना

👉 समाज के लोगों को टेक्नोलॉजी और विज्ञान का सही उपयोग करना सिखाना

👉 युवाओं के प्रतिभा को समाज के सामने लाने के लिए मंच प्रदान करने का कार्य करेगी

            * जैसे कोई अच्छा गा सकता है 

            * अच्छा डांस कर सकता है

            * अच्छा  चित्रकारी कर सकता है

           *  अच्छा लिख सकता है

           *  बच्चों को अच्छी तरह से पढ़ा सकता है

           *  राजनीति में जाने के इच्छुक है 

           *   खेलकूद में रुचि रखते हैं
👉  ऐसे युवा एवं युवतियों को उनके कला एवं प्रतिभा के अनुसार उनके लिए मंच एवं माध्यम   प्रदान करने का कार्य करेगी


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